विकास की दृष्टि से देखें तो बिहार देश का एक अभिन्न अंग होते हुए भी अभी भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह राज्य हमेशा से राजनीति, समाज और संस्कृति का केंद्र रहा है। हालांकि आर्थिक मामलों में आज बिहार का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर माना जाता है। वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, बिहार भारत की जीडीपी में लगभग 15वें स्थान पर आता है।
बिहार की अपनी एक अलग पहचान है—चाणक्य की धरती से लेकर जेपी आंदोलन तक, इस राज्य ने देश को कई बड़े नेता और ऐतिहासिक आंदोलन दिए हैं। लेकिन इतने गौरवशाली इतिहास के बावजूद, बिहार विकास के मामले में पीछे क्यों रह गया — यह सवाल आज भी चिंतन का विषय है। क्या आज का बिहार वही पुरानी गौरवशाली पहचान दोबारा हासिल कर पाएगा, या फिर सत्ता के समीकरण ही हर चुनाव की दिशा तय करते रहेंगे?
विकास या सिर्फ सत्ता की चाह?
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आज़ादी के इतने सालों बाद भी हमारे देश और खासकर बिहार जैसे राज्यों में हालात बहुत हद तक नहीं बदले हैं। आज भी जनता बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं से जूझ रही है। राजनीतिक दल हर चुनाव में बड़े-बड़े वादे तो करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि वे वादे सिर्फ सत्ता पाने का माध्यम हैं या वास्तव में विकास का सपना साकार करने की कोशिश?
बिहार जैसे राज्य में जहाँ युवा जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है, वहां बेरोज़गारी आज भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। सरकारी अस्पतालों की हालत, गांव-शहर के स्कूलों की स्थिति और रोजगार के अवसर—ये मुद्दे बार-बार उठते हैं, लेकिन हल अधूरा ही रहता है।
क्या इस बार बिहार चुनाव 2025 में सच में विकास को प्राथमिकता दी जाएगी? या फिर राजनीति एक बार फिर जाति और सत्ता के खेल में उलझकर रह जाएगी?
विकास की बात करो, आरोप-प्रत्यारोप नहीं
हर चुनाव में नेताओं का वही पुराना खेल चलता है—वादों की भरमार और काम का अभाव। हर पार्टी बड़ी-बड़ी घोषणाएं करती है, लेकिन जब सत्ता में आती है तो वादे भूल जाती है। जनता का भरोसा बार-बार तोड़ा जाता है। आखिर कब तक सिर्फ वादे करके जनता को बेवकूफ बनाया जाता रहेगा?
बिहार की हकीकत यह है कि आज भी यहां के युवाओं और नौजवानों को अच्छी शिक्षा और रोजगार के लिए राज्य से पलायन करना पड़ता है। लाखों युवा दूसरे राज्यों की ओर रुख करते हैं क्योंकि अपने ही प्रदेश में उन्हें अवसर नहीं मिलते।
राजनीतिक दलों को समझना होगा कि जनता अब सिर्फ खोखले भाषणों से संतुष्ट नहीं होगी। वादे करो, लेकिन उन्हें पूरा भी करो।
आखिर बिहार के लोग भी एक बेहतर भविष्य, अच्छी सड़कों, बिजली, स्वास्थ्य सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के हकदार हैं। विकास की बात होगी, तभी भविष्य बदलेगा—वरना सत्ता की ये लड़ाई आगे भी यूं ही चलती रहेगी।
सच का साथ दो, न कि जाति या बड़े नाम देखकर
बिहार की राजनीति में चारा घोटाला जैसी घटनाएं सिर्फ भ्रष्टाचार की नहीं, बल्कि जनता की सोच की भी पोल खोलती हैं। लालू प्रसाद यादव जैसे नेता, जिन पर करोड़ों के घोटाले साबित हो चुके हैं, आज भी लोगों के ‘नेता’ बने बैठे हैं। असली गलती नेताओं की नहीं है—असल गलती हम जनता की है, जो बार-बार जाति, धर्म या किसी बड़े नाम को देखकर वोट दे देती है, उनके असली काम पर नहीं। सोचिए, जो नेता अपने इलाज के लिए एम्स (AIIMS) जैसे बड़े अस्पतालों में जाते हैं, वे खुद 2–3 बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बिहार में एक अच्छा सरकारी अस्पताल तक नहीं बना पाए। ये नेता अपने लिए तो देश के सबसे बड़े अस्पतालों का सहारा लेते हैं, लेकिन जनता को आज भी गांव-गांव में टूटी हुई अस्पताल की बिल्डिंग, दवा की कमी और डॉक्टरों की अनुपलब्धता का सामना करना पड़ता है।
अगर आप वोट देते समय यह नहीं पूछेंगे कि आपके जिले में अस्पताल क्यों नहीं है, तो फिर दोष किसका है?
जब तक हम जाति और चेहरा देखकर वोट देना बंद नहीं करेंगे, और सच को आधार नहीं बनाएंगे, तब तक बिहार का हाल नहीं बदलेगा।
हर चुनाव के बाद हालात वैसे ही रह जाते हैं, क्योंकि हम बार-बार जाति, धर्म या बड़े नेताओं के नाम पर वोट देते हैं। अब समय है अपनी सोच बदलने का।
तो आखिर जनता क्या करे?
अब जनता क्या करे
सवाल पूछे – अपने उम्मीदवार से पूछिए कि आपके इलाके में स्कूल, अस्पताल और रोजगार क्यों नहीं हैं?
वादों पर नहीं, काम पर भरोसा करें – भाषणों और प्रचार के बजाय पिछले 5 साल में हुए काम को देखें।
जाति और पार्टी नहीं, विकास चुनें – याद रखिए, जाति और पार्टी का नाम आपके बच्चों का भविष्य नहीं बना सकता।
नेता नहीं, नीति चुनें – कौन बेहतर योजना और ईमानदार क्रियान्वयन देगा, उसे वोट दीजिए।
सोच समझकर मतदान करें – हर वोट बिहार के भविष्य को बदल सकता है। वोट की कीमत को समझिए।
याद रखिए, सही सरकार चुनना सिर्फ हक नहीं, जिम्मेदारी है
