बिहार बंद: सरकार पर सियासी प्रहार!

बिहार की राजनीति एक बार फिर गर्माई हुई है। इस बार मुद्दा है वोटर लिस्ट रिवीजन का। हर चुनाव से पहले वोटर लिस्ट का संशोधन एक सामान्य और ज़रूरी प्रक्रिया होती है, जिससे सही मतदाताओं को जोड़ा जा सके और मृत या गलत नाम हटाए जा सकें। लेकिन इस बार इस प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों ने इतना बवाल खड़ा कर दिया है कि बिहार बंद का ऐलान कर दिया गया है

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव इस विरोध प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे हैं। पटना में आयकर गोलंबर से निर्वाचन कार्यालय तक मार्च किया जाएगा जिसमें महागठबंधन के तमाम घटक दल शामिल होंगे — जैसे कि RJD, कांग्रेस, वाम दल, VIP पार्टी और पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी।

बिहार वोटर लिस्ट रिवीजन: विरोध या भ्रम फैलाने की कोशिश?

चुनाव आयोग द्वारा कराया जाने वाला वोटर लिस्ट रिवीजन एक पारदर्शी प्रक्रिया होती है। BLO (Booth Level Officer) घर-घर जाकर जांच करते हैं कि कौन नागरिक अब भी योग्य मतदाता है और कौन नहीं।

तेजस्वी यादव का बयान: गरीबों के नाम हटाए जा रहे हैं

तेजस्वी यादव का आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत गरीबों के नाम जान बूझकर हटाए जा रहे हैं, जिससे उन्हें फ्री राशन, पेंशन और दूसरी योजनाओं से वंचित किया जा सके। उनके अनुसार, इससे सीधे तौर पर ग़रीब वर्ग की सुविधाएं प्रभावित होंगी।
लेकिन क्या सिर्फ “फ्री योजनाओं” की राजनीति ही अब सरकार का मुख्य काम रह गया है? क्या हर मुद्दे को गरीब बनाम अमीर बनाकर दिखाना ही राजनीतिक हथियार बन चुका है?

क्या फ्री सुविधाएं वाकई मदद करती हैं?

कोई भी योजना तब तक सही है जब तक वह जरूरतमंद तक पहुंचे, लेकिन जब फ्री योजनाएं राजनीतिक हथियार बन जाएं, तो नुकसान ज्यादा होता है। इससे समाज में मेहनत की भावना खत्म होती है और लोग सरकारी सुविधाओं पर पूरी तरह निर्भर हो जाते हैं।

सरकार की असली ज़िम्मेदारी होनी चाहिए:

  • युवाओं को रोज़गार देना
  • स्कूलों की गुणवत्ता बढ़ाना
  • अस्पतालों को बेहतर बनाना
  • महंगाई पर नियंत्रण रखना

बिहार बंद जैसे आह्वान से सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता को ही होता है।

  • दफ्तरों में कामकाज ठप
  • सड़कें जाम
  • मरीजों और यात्रियों को परेशानी

क्या ये समस्याएं विपक्ष की रणनीति में शामिल नहीं हैं? क्या विरोध का तरीका ऐसा नहीं होना चाहिए जो रचनात्मक हो और जनता की मुश्किलें न बढ़ाए?

बिहार को आगे बढ़ाने के लिए मुफ्त घोषणाओं से ज़्यादा ज़रूरी है रोज़गार, शिक्षा और असली विकास। विपक्ष को चाहिए कि वह शोर मचाने के बजाय समाधान सुझाए और लोकतंत्र को मजबूत करे, न कि जनता को असहज।

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