क्यों हुआ Operation Sindoor?
Operation Sindoor भारत की ओर से 7 मई 2025 को शुरू किया गया एक सटीक सैन्य अभियान था। इसका उद्देश्य था पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में मौजूद आतंकी ठिकानों को तबाह करना, जो लंबे समय से भारतीय नागरिकों पर हमलों की साजिश रच रहे थे। यह कार्रवाई केवल 23 मिनट में पूरी की गई, जिसमें आधुनिक मिसाइल, AI ड्रोन और राफेल जेट्स का इस्तेमाल हुआ।
इस ऑपरेशन की पृष्ठभूमि बनी 22 अप्रैल 2025 को हुआ पहलगाम हमला, जिसमें 26 निर्दोष नागरिकों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। हमला उस वक्त हुआ जब लोग धार्मिक आयोजन की तैयारी में लगे थे। इस क्रूर हमले की जिम्मेदारी Jaish-e-Mohammed और Lashkar-e-Taiba जैसे आतंकी संगठनों पर आई, जिन्हें पाकिस्तान से समर्थन मिलता रहा है
Operation Sindoor पर जनता की राय
Operation Sindoor को लेकर सोशल मीडिया, न्यूज़ चैनलों और पब्लिक फोरम्स पर जनता की राय दो हिस्सों में बटी हुई दिखती है:
समर्थन में आवाज़ें:
बड़ी संख्या में लोग इसे एक जरूरी और साहसी कदम मान रहे हैं।
हैशटैग #SindoorKaBadla और #IndianArmyStrong ट्रेंड कर रहे हैं।
लोगों का मानना है कि अब सरकार सिर्फ बात नहीं करती, सीधे एक्शन लेती है।
सवाल उठाने वाले:
कुछ वर्गों का कहना है कि सरकार ने ऑपरेशन के सबूत सार्वजनिक नहीं किए।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर इसका प्रभाव या पुष्टि दिखाई नहीं दी, जिससे संदेह बना है।
कुछ इसे चुनावी माहौल में भावनात्मक लहर बनाने की कोशिश मानते हैं
Operation Sindoor पर क्यों विपक्ष नाखुश?
Operation Sindoor के बाद पूरे देश में जहाँ जनता ने भारतीय सेना की बहादुरी को सलाम किया, वहीं विपक्ष ने इस ऑपरेशन की पारदर्शिता पर सवाल उठाए। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार ने 25 से अधिक आतंकियों के मारे जाने का दावा किया है, लेकिन इसके कोई पुख्ता सबूत अब तक सार्वजनिक नहीं किए गए। कांग्रेस और कुछ अन्य दलों ने इसे “चुनावी स्टंट” और “मीडिया मैनेजमेंट” करार दिया।
उनका यह भी कहना है कि अगर हमला इतना बड़ा और सटीक था, तो उसके स्पष्ट प्रमाण — जैसे सैटेलाइट इमेज, ड्रोन फुटेज, या तृतीय पक्ष पुष्टि — अब तक सामने क्यों नहीं लाए गए? क्या ये केवल एकतरफा दावा है?
लेकिन सवाल ये भी उठता है: क्या विपक्ष का काम सिर्फ विरोध करना है?
हर मुद्दे पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब बात हमारी सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा की हो, तो क्या हर बार अविश्वास जताना सही है? अगर देश के जवान कह रहे हैं कि उन्होंने पलटवार किया है, तो हमें उनका मनोबल बढ़ाना चाहिए ना कि उनकी कार्रवाई को संदिग्ध बना देना चाहिए।
बताया जा रहा है कि आज शाम 6 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में इस मुद्दे पर जवाब दे सकते हैं।
अब देखना यह होगा कि उनके बयान के बाद विपक्ष के तेवर नरम पड़ते हैं या और तीखे होते हैं।
सवाल ज़रूरी हैं, पर विश्वास भी
हमें ये भले ही ठीक-ठीक न पता हो कि Operation Sindoor में कितने आतंकवादी मारे गए — 10, 20 या शायद उससे कहीं ज़्यादा।
लेकिन एक बात हमें बिल्कुल स्पष्ट समझ लेनी चाहिए — जब हमारे जवान कहते हैं कि उन्होंने जवाब दिया, दुश्मन को ढूंढकर मारा, उसके ठिकानों को नेस्तनाबूद किया — तो हमें उनकी हर बात पर भरोसा करना चाहिए।
ये वही जवान हैं जो -45 डिग्री में सीमा पर खड़े हैं, जिनके लिए देश सबसे ऊपर है, और जिनकी हर सांस भारत माता के लिए है।
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना हमारा अधिकार है, और ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें ये करना भी चाहिए।
लेकिन सवाल जब सेना की नीयत, साहस, और बलिदान पर उठने लगें — तो ये सिर्फ राजनीति नहीं रह जाती, ये राष्ट्र की आत्मा पर हमला बन जाता है।
सोचिए — अगर हम अपने ही सैनिकों की नीयत पर शक करेंगे,
तो फिर हमारे और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों में फर्क क्या रह जाएगा?
उनका काम हमारे हौसले तोड़ना है — क्या हम खुद वही करने लगे हैं?
Operation Sindoor सिर्फ एक जवाबी हमला नहीं था — ये एक संदेश था।
भारत अब चुप नहीं बैठेगा। अब हम सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं, रणनीति से चलेंगे।
अब हम सिर्फ सहेंगे नहीं, बल्कि जहां से हमला होता है, वहीं तक पहुंचकर जवाब देंगे।
ये ऑपरेशन हमारे बदलते आत्मविश्वास, बदलती सैन्य सोच और बढ़ती वैश्विक स्थिति का प्रतीक है।
बस ज़रूरत है कि हम इसे राजनीति से ऊपर उठकर, एक राष्ट्र के दृष्टिकोण से देखें।
आइए, जवानों को राजनीति के जाल से दूर रखें।
क्योंकि जब वो देश के लिए अपनी जान दांव पर लगाते हैं,
तो उन्हें हमारी समर्थन की आवाज़ चाहिए — सवाल नहीं।
