Vikas Barala का AAG बनना: कितना सही, कितना गलत?

हमारे Vikas Barala जी को Assistant Advocate General (AAG) बना दिया गया — और वजह क्या है? सिर्फ ये कि वो भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे हैं।

इस देश में अब काबिलियत, स्किल या ईमानदारी नहीं, बल्कि सरनेम, राजनीतिक पहुंच और सत्ता से नज़दीकी ही सबसे बड़ा क्वालिफिकेशन बन चुका है।
हमने पहले भी बार-बार देखा है कि चाहे किसी व्यक्ति की आपराधिक छवि हो, महिलाओं पर अत्याचार के आरोप हों या पूरी तरह से योग्यता का अभाव — अगर वो सत्ता के दरवाज़े पर वफादारी निभाता है, तो उसे कुर्सी ज़रूर मिलती है।

कुछ शर्मनाक उदाहरण जो लोकतंत्र को तमाचा मारते हैं:

  • अतीक अहमद – एक दर्जन से ज़्यादा संगीन मामलों में आरोपी, फिर भी समाजवादी पार्टी से विधायक बना और मंत्री भी बन गया।
  • निरंजन हीरानंदानी का बेटा – ज़मीन घोटाले में नाम सामने आया, फिर भी राजनीतिक सिफारिशों पर महाराष्ट्र सरकार के बोर्ड में जगह मिली।
  • और अब Vikas Barala – जिस पर 2017 में IAS की बेटी से छेड़छाड़ और पीछा करने का केस दर्ज हुआ था, वो अब हरियाणा सरकार का कानूनी चेहरा बना दिया गया है।

कानून तोड़ने वाले ही अब कानून के रखवाले? – Vikas Barala का AAG बनना: कितना सही, कितना गलत? की नियुक्ति पर सवाल

2017 में जिस व्यक्ति पर गंभीर आपराधिक मामला दर्ज हुआ — वही अब सरकार की ओर से न्यायालय में वकालत करेगा?
ये कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का कड़वा सच है।

Vikas Barala पर आरोप है कि उन्होंने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर रात के समय IAS अफसर की बेटी का पीछा किया, गाड़ी से उसे ब्लॉक किया और नशे की हालत में छेड़छाड़ की कोशिश की।
पूरा देश उस समय इस मामले को देख रहा था। CCTV फुटेज, कॉल रिकॉर्ड और लड़की के बयान के आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया गया, और आज भी वो जमानत पर बाहर हैं।

क्या AAG की कुर्सी इतनी सस्ती हो गई है?

AAG यानी Assistant Advocate General — यह एक बेहद जिम्मेदार पद है। ये व्यक्ति राज्य सरकार की ओर से हाई कोर्ट में कानून का पक्ष रखता है।
इस पद के लिए ज़रूरी है:

मजबूत कानूनी ज्ञान और अनुभव

संविधान की समझ

नैतिक चरित्र

और जनता का भरोसा

अब सवाल यह है कि क्या Vikas Barala इन सभी मानकों पर खरे उतरते हैं?

” Vikas Barala प्रकरण: सरकार की खामोशी और जनता का उबाल”

हरियाणा सरकार की ओर से अभी तक इस विवाद पर कोई औपचारिक बयान नहीं आया है। न ही यह बताया गया कि विकास बराला को किस प्रक्रिया के तहत इस पद के लिए चुना गया।
क्या उन्हें सिर्फ उनके राजनीतिक कनेक्शन और “बराला” सरनेम के आधार पर नियुक्त किया गया?

सोशल मीडिया पर जनता का गुस्सा फूट पड़ा है:

“जिन्हें जेल में होना चाहिए, वो वकील बनकर सरकार का चेहरा बन रहे हैं।”
“महिला सुरक्षा पर भाषण देने वाली पार्टी अब एक आरोपी को संवैधानिक पद दे रही है।”

विपक्षी दलों ने भी इसपर हमला बोलते हुए कहा कि भाजपा का महिला सुरक्षा पर दावा अब खोखला साबित हो रहा है।

अगर यही कांग्रेस ने किया होता तो?

कल्पना कीजिए, अगर यही नियुक्ति कांग्रेस सरकार में हुई होती — तो क्या भाजपा और उसका आईटी सेल चुप बैठता?
शायद नहीं।
लेकिन अब जब मामला अपनी सरकार का है, तो सब शांत हैं। यही दोगलापन जनता की सबसे बड़ी नाराज़गी है।

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कब बदलेगी ये मानसिकता?

विकास बराला की नियुक्ति सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं है, ये उस राजनीतिक सोच का आइना है जहां अपराध की परवाह नहीं, सिर्फ नज़दीकी मायने रखती है।
जब कानून के रक्षक वही लोग बनते हैं जो खुद कानून तोड़ चुके हैं, तब जनता के भीतर न्याय व्यवस्था से भरोसा खत्म होना तय है।

यह सिर्फ नियुक्ति नहीं है — यह लोकतंत्र के चेहरे पर एक और थप्पड़ है

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