भाषा: सहूलियत या श्राप?

भारत विविधताओं का देश है – यहाँ हर सौ किलोमीटर पर भाषा बदल जाती है। फिर भी, आज हम इस बात पर उलझे हुए हैं कि कौन-सी भाषा “बड़ी” है और कौन-सी “छोटी”? क्या यह सच में आज का सबसे ज़रूरी मुद्दा है?

आज भी हमारे देश में:

लाखों लोग इलाज के लिए तरसते हैं,

करोड़ों युवा रोज़गार के इंतज़ार में हैं,

और भूख एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है।

Global Hunger Index 2024 में भारत का स्थान 105वां है (127 देशों में)। यानी आज भी लाखों लोग दो वक़्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

तो सवाल यह है कि जब देश इतनी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, तब भाषा को लेकर लड़ना क्या वाकई ज़रूरी है?

भारत की भाषाई विविधता: एक ताक़त, कोई चुनौती नहीं

भारत में लगभग 121 भाषाएं और 19,500 बोलियाँ बोली जाती हैं। हर कोई अपनी मातृभाषा में सहज होता है — कोई हिंदी में, कोई तमिल में, कोई मराठी या बांग्ला में।

लेकिन अफ़सोस की बात है कि कुछ लोग अपनी भाषा को दूसरों पर थोपना चाहते हैं।
भाषा जब तक संवाद का माध्यम है, तब तक सहूलियत है।
लेकिन जब इसे घमंड, राजनीति या वर्चस्व दिखाने का हथियार बना लिया जाए — तब यह एक विभाजन की जड़ बन जाती है।

हम कहते हैं कि हमें ‘अखंड भारत’ और ‘सुपरपावर’ बनाना है।
तो फिर एक-दूसरे की भाषा को नीचा दिखाकर, अपमानित करके, हम किस दिशा में जा रहे हैं?

देश को आगे बढ़ाना है तो भाषा पर नहीं, भूख, बेरोज़गारी और शिक्षा जैसे मुद्दों पर लड़ना होगा।
भाषा को माध्यम बनाइए, मुकाबला नहीं।

भाषा हमारी पहचान है, लेकिन जब वही पहचान दूसरों पर थोप दी जाए, तो वह जुड़ाव नहीं, दूरी पैदा करती है।
जरूरत है भाषा को सम्मान से देखने की, न कि उसे किसी की “औकात” से जोड़ने की।

भाषा तब तक सहूलियत है, जब तक उसमें अपनापन है।
जब वह घमंड बन जाए — तो वह वरदान नहीं, टकराव का कारण बन जाती है।

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